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गोरखपुर-फूलपुर उपचुनाव – क्या सपा-बसपा गठबन्धन बदल पायेगा राजनैतिक समीकरण

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उत्तरप्रदेश के विधानसभा चुनावों के बाद भाजपा जिस तरीके से प्रदेश में मजबूत हुई है उससे वहां के क्षेत्रीय दल काफी मुश्किल में हैं, इनमे सबसे ज्यादा नुकसान अखिलेश यादव की सपा को हुआ जो विधानसभा चुनावों में करारी हार के बाद निकाय चुनावों में अपनी मजबूती की आस लगाये बैठी थी लेकिन यहाँ भी इसको मुह की खानी पड़ी लेकिन बसपा ने विधानसभा चुनाव के बाद निकाय चुनाव में अच्छा प्रदर्शन किया और अपने आधार की ओर लौटती हुई दिखी, लेकिन सपा के हाल अब भी बेहाल ही हैं.

 

निकाय चुनावों के बाद उत्तरप्रदेश का चुनावीरण गोरखपुर तथा फूलपुर में होने वाले चुनावों के लिए एक बार फिर सज चुका है, ये दोनों सीटें योगी आदित्यनाथ तथा केशव मौर्य के राज्य विधायिका में चले जाने के कारण खाली हुई है, इन दोनों जगहों पे भाजपा जहाँ अपना दम दिखा रही हैं वही सपा ने भी अपनी तैयारिया पुख्ता की है. इन सीटों पर जीत हासिल करने के लिए ‘बुआ तथा बबुआ’ ने आपस में गठबंधन भी किया है जिसके तहत बसपा इन सीटों पर सपा का समर्थन करेगी और इसके बदले में सपा बहनजी मायावती को राज्यसभा पहुचने में मदद करेगी.

 

आइये जानते हैं की क्या यह गठबंधन यहाँ कारगर होगा, कौनसी चुनौतियाँ है जिनसे अखिलेश तथा मायावती को पार पाना होगा

 

इससे पहले सपा और बसपा का गठबंधन 1993 में देखने को मिला था जब विधानसभा चुनाव में मुलायम सिंह यादव और काशीराम साथ आये थे, तब इन्होने मिलकर 177 सीटें जीती थी तथा भाजपा को प्रदेश से वनवास पे जाने के लिए मजबूर कर दिया था. लेकिन वैचारिक धरातल पे एकता नहीं होने के कारण यह गठबंधन ज्यादा समय नहीं चल पाया था और मात्र दो साल बाद यह गठबंधन 1995 में हवा हो गया और सिर्फ हवा नहीं हुआ इस गठबंधन का टूटना इतना दर्दनाक था की जिसकी आवाज आज भी प्रदेश के राजनैतिक गलियारों में सुनाई देती है. 1995 में गठबंधन टूटने तक तो उनकी कड़वाहट इतनी बढ़ गई थी कि लखनऊ में एक गेस्ट हाउस में ठहरी मायावती ‘सपा के गुंडों’ तक की शिकार होते-होते बची थीं। कहते हैं कि बात तब सिर्फ इसलिए बिगड़ी कि दोनों पार्टियों में से कोई भी सत्ता में बड़े हिस्से का लोभ संवरण नहीं कर पाई थीं और सपा के तत्कालीन सुप्रीमो और मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव को उनकी ‘शातिर चालाकियों’ का मजा चखाने के लिए बसपा सुप्रीमो कांशीराम ने बहुजनों के हित में हर अवसर के इस्तेमाल का ‘पल्टीमार सिद्धांत’ गढ़ डाला था। इसी के तहत मायावती भाजपा के समर्थन से मुख्यमंत्री बनीं तो कोई सैद्धांतिक मतभेद न होने के बावजूद, महज मायावती व मुलायम की व्यक्तिगत खुन्नसों एवं ग्रंथियों के कारण सपा-बसपा एक दूजे की चिर प्रतिद्वंद्वियों में बदल गईं और समय के साथ उनके रिश्ते इतने खराब हो गए कि फिर उनके एक साथ आने की कल्पना तक नहीं की जाती थी। इन परिस्थितियों में सपा और बसपा अगर 23 साल बाद आज साथ आ भी जाती है तो दोनों में वैचारिक टकराव होना निश्चित है साथ ही यह भी समस्या है की नेता किसे माना जायेगा अखिलेश यादव या मायावती को  साथ ही बसपा के लिए रेस्ट हाउस कांड को भुलाना भी इतना आसान नहीं होगा. फिर भी अगर अखिलेश यादव येन केन प्रकारेण अगर बसपा से गठबंधन ( अभी जो उपचुनावों में हुआ है वो मात्र राज्यसभा चुनाव के लिए हुआ समझौता ही है ) कर भी लेते है तो मुलायम सिंह यादव तथा शिवपाल यादव को समझाने में उन्हें खासी मेहनत करनी पड़ेगी क्यूंकि नेताजी तथा मायावती के बीच की कडवाहट आज की नहीं है उसे दूर करना इतना आसन नहीं है, साथ ही मायावती और अखिलेश के सामने जमीनी स्तर पर भी अपने गठबंधन को स्वीकृति दिलाने के लिए भागीरथ प्रयास करने पड़ेगे.

अगर हम विधानसभा चुनाव के आंकड़ों को देखे तो सपा और बसपा के साथ आने से भाजपा की मेहनत बढ़ गई है, पिछले विधानसभा में सपा को 28% तथा बसपा को 22% वोट, कुल 50% वोट मिलें थे, जिससे भाजपा को थोड़ी मुश्किल हो सकती है. लेकिन अगर लोकसभा चुनावों में आंकड़ों पे गौर करे तो ऐसा लगता है की भाजपा यहाँ आसानी से निकल जाएगी. पिछले लोकसभा चुनाव में गोरखपुर से भाजपा को 5 लाख 39 हजार 137 वोट मिले थे, सपा को 2 लाख 26 हजार 344 वोट मिले थे वही बसपा को 1 लाख 76 हजार 412 वोट मिले थे. अगर हम सपा और बसपा के कुल वोटों को जोड़ ले तप भी योगी आदित्यनाथ के जीत का अंतर 1 लाख 36 हजार वोटों से ज्यादा का है, ऐसी स्थिति में जिस सीट पे गोरक्षपीठ का प्रभाव हो, जहाँ का पूर्व सांसद प्रदेश का वर्तमान मुख्यमंत्री हो और जहाँ हार का अंतर इतना ज्यादा रहा हो वहां इस गठबंधन के बाद भी इन्हें जितने के लिए किसी चमत्कार और कसी हुई रणनीति की जरुरत होगी. अगर फूलपुर के आंकड़े देखे तो वहां भी सपा और बसपा की गोरखपुर जैसी स्थिति ही है,यहाँ केशव प्रसाद मौर्य को पिछले चुनावों में  पांच लाख 39 हजार 137 वोट मिले थे. सपा को सपा को 1 लाख 95 हजार 256 तथा बसपा को  1 लाख 63 हजार 710 वोट मिले थे. सपा-बसपा के वोट मिलाने  के बाद भी बीजेपी के केशव मौर्य को 1 लाख 44 हजार 598 वोट ज्‍यादा मिले थे. लेकिन गोरखपुर के मुकाबले फूलपुर की सीट अगर सपा-बसपा मेहनत करे तो निकाल सकती है क्यूंकि यह सीट भाजपा की परम्परागत सीट नहीं रही है और मौर्य के बाद किसी अन्य नेता का इस क्षेत्र में ऐसा होल्ड देखने को नहीं है, साथ ही यहाँ के जातीय समीकरण भी अगर तरीके से साधे गए तो सपा-बसपा को फायदा दे सकतें है, लेकिन आंकड़ों की रौशनी में यह कहा जा सकता है की दोनों सीटों पर लड़ाई सपा-बसपा के लिए इतनी आसान नहीं है, भाजपा की जीत तो दिख रही है लेकिन सपा-बसपा अच्छी रणनीति से उतरती है तो फूलपुर में भाजपा का नुकसान कर सकती है, गोरखपुर में भाजपा की राह फूलपुर के मुकाबले आसान है.

 

इन उपचुनावों में बसपा की  दिलचस्पी शुरुआत से ही नहीं थी इन्होने तो बस राज्यसभा पहुचने के लिए सौदा किया है, वोटो के आधार पर दोनों निर्वाचन क्षेत्रों को अगर स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर भी देखा जाये तो, गोरखपुर की सीट प्रारम्भ से भी भाजपा की परम्परागत सीट रही है आर इसपे गोरक्षपीठ का दबदबा भी है जो इसे किसी और के पाले में जाने नहीं देगा, गोरखपुर में जहाँ गोरक्षपीठ की सर्व समाज में धाक है जिसका फायदा भाजपा के उम्मीदवार  उम्मीदवार उपेन्द्र दत्त शुक्ल को मिलेगा, इसके अलावा इस सीट पर सवर्णों का प्रभुत्व है जिसका लाभ भी भाजपा को मिलेगा. सपा ने इस सीट पर अपना इस सीट पर अपना पूरा फोकस यादवों, पिछड़ी जाति, दलितों तथा निषाद वोटों पे रखा है जिसमे दलितों, पिछड़ी जातियों के आधे-आधे वोट दोनों धडों में बंट जायेगा, यादवों का इस क्षेत्र में कुछ प्रतिशत इस क्षेत्र में परंपरागत भाजपा समर्थक तथा गोरक्षपीठ के समर्थक रहें है इसलिए यादवों के भी पुरे वोट इनको मिलने वाले नहीं है, ऐसे में अखिलेश ने इस क्षेत्र में अपनी अच्छी खासी मत संख्या रखने वाली निषाद जाति पे दाव खेला है, इसलिए निषादों के वोटों को अपने पक्ष में लामबंद करने के लिए स्थानीय निषाद पार्टी से गठबंधन कर के निषाद पार्टी के अध्यक्ष के इंजीनियर के बेटे प्रवीन निषाद को मैदान में उतारा है लेकिन इन सारी कवायदों के बाद भी यहाँ सपा-बसपा की जीत टेढ़ी खीर ही लग रही है.

 

जहाँ तक फूलपुर का प्रश्न है यह जवाहरलाल नेहरू की सीट रही है तथा इस क्षेत्र में ब्राह्मणों तथा सवर्ण मतदाताओं का महत्व है जिसे ध्यान में रख कर कांग्रेस ने यहाँ मनीष मिश्र को टिकट दिया है लेकिन कांग्रेस को इसका फायदा नहीं मिलेगा क्यूंकि ब्राह्मण समुदाय तथा सवर्ण समाज  का अधिकतम वोटर भाजपा के पक्ष में लामबंद है. इस सीट पर पिछड़ी जातियों, कुर्मी समुदाय तथा मुसलमानों का  सर्वाधिक महत्व है  इसीलिए भाजपा तथा सपा दोनों ने कुर्मी समुदाय के कौशलेन्द्र सिंह पटेल ( भाजपा ) तथा नागेन्द्र पटेल ( सपा ) को टिकट दिया है. इस क्षेत्र में कुर्मी समुदाय तथा पिछड़ी जातियों में केशव प्रसाद मौर्य लोकप्रिय हैं तथा उपमुख्यमन्त्री होने के कारण क्षेत्र की उनसे आसा भी है, जिससे इन वोटों को अपनी तरफ करने में सपा को मुश्किल होगी. जहाँ तक मुसलमानों का सवाल है, क्षेत्र का मुसलमान सपा सरकार से नाराज है वो यह मानता है की सपा के लिए वह मात्र वोट और इस्तेमाल की वस्तु के अलावा और कुछ नहीं है ऐसे में बसपा से नाराज अतीक अहमद के ताल ठोकने के कारण मुसलमान वोट अधिकतम मात्रा में अतीक की झोली में गिरेगा उसके बाद यह वोट कांग्रेस और भाजपा में बट जायेगा, लेकिन अगर बसपा अतीक अहमद को मना लेती है और सपा अगर बसपा के सहारे कुर्मी, दलित तथा मुसलमान वोटों में सेंध लगा लेती है तो भाजपा के लिए मुश्किल हो सकती है, बहरहाल वर्तमान समीकरणों के आधार पर यही कहा जा सकता है की सपा और बसपा के इस गठजोड़ से भाजपा को कोई नुकसान नहीं होगा, दोनों सीटों पर भाजपा जीत जाएगी जहाँ गोरखपुर की सीट आसानी से निकल जाएगी वही फूलपुर में अच्छी टक्कर देखने को मिल सकती है.

3 thoughts on “गोरखपुर-फूलपुर उपचुनाव – क्या सपा-बसपा गठबन्धन बदल पायेगा राजनैतिक समीकरण

    1. जी नहीं मै बिलकुल सहमत नहीं हूँ क्यूंकि पिछड़ी जातियों और मुस्लमान समुदाय के वोट अगर सपा-बसपा दोनों एक साथ हैं तो साफ़ जाहिर होता है कि बीजेपी का हारना सुनिश्चित है

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